केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में कृष्ण-मृग के शावक का जन्म,संरक्षण के लिए एक बहुत बड़ी सफलता 
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केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में कृष्ण-मृग के शावक का जन्म,संरक्षण के लिए एक बहुत बड़ी सफलता 

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केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में कृष्ण-मृग के शावक का जन्म,संरक्षण के लिए एक बहुत बड़ी सफलता 

Bishnoi Samachar Digital Desk नई दिल्ली- केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में लगभग दो दशक के बाद दो मादा कृष्ण मृगों ने एक-एक शावक को जन्म दिया है। ये दोनों मादा कृष्ण मृग करौली से केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में लाये गए थे। कृष्ण मृग के शावकों का जन्म होना संरक्षण व संवर्धन के लिए एक बहुत बड़ी सफलता है साथ ही यह एक क्षेत्र से विलुप्त हुई प्रजाति को दोबारा से सुरक्षित रूप से उसके प्राकृतिक परिवेश में फिर से बसाया जाने के एक सफल उदाहरण भी है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान का परिस्थितिकी तंत्र अलग-अलग प्रकार की प्रजातियों के लिए पूर्ण रूप से अनुकूल है।

उद्यान प्रशासन ने मादा कृष्ण मृग और शावकों पर पूरी तरह निगरानी रखी जा रही है।

केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान के उप वन संरक्षक मानस सिंह ने बताया कि उद्यान में इन दिनो बड़ी संख्या में देशी - विदेशी पर्यटक भ्रमण करने के लिए आ रहे है। ऐसे में पक्षियों और अन्य वन्यजीवों के साथ कृष्ण मृग भी उनके लिए एक विशेष आकर्षण का केंद्र है। वहीं उद्यान प्रशासन ने मादा कृष्ण मृग और शावकों पर पूरी तरह निगरानी रखी जा रही है।

केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान विश्व मानचित्र पर न केवल एक रामसर वेटलैंड साइट के रूप में जाना जाता है, बल्कि यूनेस्को वर्ल्ड हैरिटेज साइट के रूप में एक विशेष पहचान स्थापित किए हुए है। चार सौ से अधिक पक्षियों कीप्रजातियों का यह घर और यहां का प्राकृतिक वातावरण कई विलुप्त होती प्रजातियों के लिए जीवनदान बन चुका है।

देशी-विदेशी पक्षियों के स्वर्ग के नाम से पहचाने जाने वाला भरतपुर जिला स्थित केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान विश्व मानचित्र पर न केवल एक रामसर वेटलैंड साइट के रूप में जाना जाता है, बल्कि यूनेस्को वर्ल्ड हैरिटेज साइट के रूप में एक विशेष पहचान स्थापित किए हुए है। चार सौ से अधिक पक्षियों की प्रजातियों का यह घर और यहां का प्राकृतिक वातावरण कई विलुप्त होती प्रजातियों के लिए जीवनदान बन चुका है। ऐसे में वन विभाग द्वारा विलुप्त होती प्रजातियों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर प्रयास किये जा रहे है।