
बीकानेर बिश्नोई समाचार नेटवर्क जोधपुर में पर्यावरण को पॉलीथिन से होने वाले नुक्सान से बचाने में खमुराम विश्नोई की मुहिम के बारे में जानकर सुखद आश्चर्य होता है. चाहे सड़क का किनारा हो, या कोई सार्वजानिक स्थल, या कहीं मेला ही क्यों न लगा हो, हर जगह इस्तेमाल होने के बाद फेंकी गयी पॉलीथिन की थैलियां, प्लास्टिक की बोतलें, चाय के कप, आदि, का ढेर बन जाता है। लोग दूरगामी परिणामों की चिंता नहीं करते हैं और यह जानने के बावजूद भी कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए कितना हानिकारक है, कचरा फैलाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते. खमुराम ने इन्हीं असंवेदनहीन लोगों को जागरूक करने और उनके हाथों फैलाई जा रही गन्दगी को साफ़ करने का बीड़ा उठाया हुआ है. अगर आप जोधपुर के रहने वाले हैं तो आपको खमुराम विश्नोई कभी भी वहां के सार्वजनिक स्थानों, स्थानीय मेलों और सड़कों से प्लास्टिक बीनते हुए दिख सकते हैं।
खमुराम जोधपुर कि ओसियां तहसील के एकलखोरी गाँव से हैं. इनके पिता का नाम कानाराम विश्नोई है और इनका जन्म 20 फ़रवरी 1966 को हुआ था. एमकॉम पास खमुराम न्यायिक सहायक के पद पर जोधपुर हाई कोर्ट में कार्यरत हैं और काम से फारिग होते ही पर्यावरण-प्रेम में लग जाते हैं. उन पर प्लास्टिक मुक्त पर्यावरण की धुन सवार है. हमारे साथ हुई बातचीत में वो बताते हैं, “प्लास्टिक को रिसायकल करने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है, उसे नष्ट करने के लिए जलाया जाए तब भी हानिकारक है और धरती में गाड़ दें तब भी वो सैंकड़ों सालों के बाद भी जस का तस बना रहेगा, उल्टा मिट्टी की उर्वरक क्षमता को नष्ट करेगा. अगर ये कचरा
इस तरह सड़कों पर खुले में पड़े रहेंगा तो जीव-जानवर भी इसे खाकर जोखिम में पड़ सकते हैं, ऐसे में मैं ये प्लास्टिक बीनकर इसे रिसायकलिंग प्लांट में भिजवाने की व्यवस्था करता हूँ और लोगों को अलग-अलग तरीकों से यह सन्देश देने की कोशिश करता हूँ कि वे प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें।
खमुराम की चिंता जायज़ भी है. जैसा कि मोकलवास स्थित गौसंवर्धन केंद्र के संचालक राजेश निहाल बताते हैं, “पॉलीथिन की थैलियां पशुओं के लिए बेहद हानिकारक हैं. लोग बड़े पैमाने पर पॉलीथिन का उपयोग करते हैं और फिर उसे इधर-उधर खुले में फेंक देते हैं. राह चलते पशु इसे गलती से खा लेते हैं. उनका पाचन तंत्र पॉलीथिन को पचाने में कारगर नहीं होता और ये प्लास्टिक उनके पेट में इकठ्ठा होकर उनकी मौत का कारण बनता है. आम तौर पर दुधारू पशु जैसे गाय और भैंसें के पॉलीथिन खाकर मरने की खबर आम हो रही है जिसका सीधा असर पशुपालक किसानों की वित्तीय स्थिति पर भी पड़ता है.” निहाल ने कहा कि पॉलीथिन के इस्तेमाल के विरोध में खमुराम ने जो पहल की है वह काबिलेतारीफ़ है.

पूत के पाँव पालने में दिखने लगते हैं।
नीम का वह पौधा आज एक वृक्ष के रूप में पूरी तरह से विकसित हो चुका है. खमूराम की पर्यावरण को लेकर प्रतिबद्धता भी वक्त के साथ पूरी तरह विकसित हो चुकी है. यह पूछने पर कि इस मुहिम को शुरू करने की प्रेरणा उन्हें कहाँ से मिली, वे बताते हैं कि एक बार वे टीवी पर एक डॉक्यूमेंट्री देख रहे थे जिसमें भारत के तीर्थस्थलों के बारे में बताया जा रहा था और उस डॉक्यूमेंट्री के अंत में लोगों द्वारा फेंकें गए प्लास्टिक के कचरे से तीर्थस्थलों पर होने वाली बदहाली और दुष्परिणामों की चर्चा भी की गई थी. बस उसी दिन से उन्होंने पॉलीथिन की थैलियों व प्लास्टिक के कचरे के खिलाफ एक मुहीम छेड़ दी।
इसकी शुरुआत उन्होंने पहले अपने गाँव के स्तर से की. गौरतलब है कि आज पॉलीथिन से बनी थैलियां हमारे देश के शहरों ही नहीं गावों में भी उतनी ही सहजता से अड्डा जमा चुकी हैं. तो खमुराम ने सबसे पहले अपने गांव के लोगों से पॉलीथिन का इस्तेमाल बंद करने की अपील की और इससे होने वाले नुक्सान के बारे में जागरूकता फैलाई. शुरू में तो लोगों ने उनकी एक न सुनी, उल्टा उन्हें पागल, सिरफिरा, वगैरह कहने लगे, लेकिन खमुराम इससे निराश होकर बैठे नहीं. जब लोगों ने उनकी एक न सुनी तो उन्होंने खुद ही एक बोरा लेकर कचरा बीनने का निश्चय किया. उन्हें जब भी समय मिलता, वे लोगों द्वारा फेंकी गयी पॉलीथिन की थैलियां और प्लास्टिक की बोतलें उठाने निकल जाते. इसके साथ-साथ वे अख़बार व रद्दी कपड़ों की थैलियां बनाकर दुकानदारों और लोगों में बाँटने लगे.
खमुराम की अथक मेहनत और प्रतिबद्धता के सामने गाँव वालों ने घुटने टेक दिया । गाँव के कुछ युवा साथी भी खमुराम के इस प्रयास में उनका साथ देने सामने आए. लोगों ने उनकी बातों पर कान देना शुरू किया.
एकलखोरी गाँव को प्लास्टिक से मुक्त करा लेने के बाद खमुराम अपने अभियान को जोधपुर शहर में ले गए और फिर पूरे मारवाड़ की तरफ अपना रुख किया. शहर की सड़कों और गलियों के साथ साथ वे धार्मिक स्थानों के मेलों में शिरकत करते. खमुराम यह बखूबी जानते थे कि मेंलों में वे अधिकाधिक जनसंपर्क कर सकते थे. खजडली शहीद मेले से लेकर, बीकानेर के नोखा का मुकाम मेला, जोधपुर का सिद्धनाथ मंदिर, गुरुपूर्णिमा का मेला, कागा का तला माता का मेला, रामदेवरा मेला , परशुराम व जनखेड़ा बालाजी मेला आदि में वे अपनी टीम के साथ जाने लगे. वे वहां श्रद्धालुओं द्वारा फेंकी गयी पॉलीथिन की थैलियां व अन्य प्लास्टिक का कचरा उठाने लगे, साथ ही यहाँ भी वे दुकानों पर कपड़े व अख़बार से बनी थैलियां बांटते. लोगों को प्लास्टिक के सम्बन्ध में जागरूक करने के लिए वे अपने सहयोगियों के साथ तरह-तरह के स्वांग धरते, नाचते-गाते, अलग-अलग स्लोगन लिखी तख्तियों को गले में टांककर मेले में घूमते और लोगों को प्लास्टिक की थैलियों व अन्य सामानों का इस्तेमाल न करने और उन्हें खुले में न फेंकने को प्रेरित करते।
इसी दौरान वर्ष 2004 में उनकी मुलाकात फ्रांस से आए पर्यावरण शोधकर्ता फ्रैंक वोगेल से हुई. वोगेल अपनी थीसिस के सिलसिले में भारत आये थे और राजस्थान के धार्मिक मेलों का अध्यन कर रहे थे. वहीं उन्होंने खुमाराम को प्लास्टिक का उपयोग बंद करने के लिए लोगों को जागरूक करते व प्लास्टिक का कचरा इकठ्ठा करते देखा और उनसे प्रभावित हुए. जैसे-जैसे समय बीतता गया खमुराम का प्लास्टिक विरोधी अभियान तेज़ होता गया. वे अब मेला कमेटियों का हिस्सा बनने लगे. मेलों में उनके द्वारा रखे आकर्षक स्लोगनों वाले कचरा पात्र नजर आते।
जोधपुर के कई हिस्सों से प्लास्टिक की थैलियों को समूल मिटाने में खमुराम का बड़ा योगदान रहा है. जैसा कि पर्यावरण एवं जीव संरक्षण नामक संस्था के संचालक व अखिल भारतीय विश्नोई महासभा के सदस्य मांगीलाल बूडिया बताते हैं, “विश्नोई समाज के पूजनीय स्थल समराथल के धोरा में एक जगह है जहां अपनी चुनरी या साफे में मिट्टी बांधकर टीले पर डालने की एक प्राचीन प्रथा है, पर समय के साथ लोगों ने कपड़ों के बजाय पॉलीथिन की थैलियां इस्तेमाल करनी शुरू कर दी थी. खमुराम ने यह बात नोट की और मेला समिति से यह आग्रह किया कि श्रद्धालुओं की इस आदत को बंद करने के लिए उन्हें सक्रिय किरदार निभाने दिया जाए. अनुमति मिलने के बाद, खमुराम ने लोगों को जागरुक करने, और उन पॉलिथीन की थैलियों को वहां से हटाने, की कवायद शुरू की. अब वहां लोगों ने फिर से कपड़ों की थैलियाँ इस्तेमाल करनी शुरू कर दी है।
पॉलीथिन के विरोध के साथ-साथ खमुराम ने विविध त्यौहारों और मांगलिक कार्यक्रम में पौधों का उपहार देना शुरू किया. इन उपहारों पर लिखा होता- पौधा लगाओ ,पेड़ बनाओ, तापमान घटाओ. लोगों को उनका यह आइडिया काफी पसंद आया. खमुराम की खूब सराहना होने लगी.
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खमुराम का आना अभी बाक़ी था. इत्तिफाक़ से 2007 में फ्रैंक पुनः भारत आए और मेलों में खमुराम को उसी शिद्द्त से अपने अभियान में लगा देखकर वे और भी ज़्यादा प्रभावित हुए. उन्होंने उनके कार्यों की एक विडियो फिल्म बनायी. इस डाक्यूमेंट्री में वैज्ञानिक तथ्यों और तर्कों के साथ यह दर्शाया गया था कि प्लास्टिक प्रकृति व मानव के लिए कितना हानिकारक है और खमुराम कैसे इसके विरुद्ध अपना अभियान चला रहे हैं. वह फिल्म इंटरनेशनल प्लेनेट वर्कशॉप में दिखाई गयी और यहीं से उन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए अपनी सोच को दुनिया तक पहुंचाने का अंतर्राष्ट्रीय मंच मिला. 13 दिसम्बर 2008 को कोर्चेवेल सिटी, पैरिस, फ़्रांस, में होने वाली तीन दिवसीय इंटरनेशनल प्लेनेट वर्कशॉप की ओर से आयोजित तीसरे ग्लोबल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया. इसके बाद वे दोबारा 2011 से 2014 में इंटरनेशनल प्लेनेट वर्कशॉप की ओर से आयोजित छठे, सातवें, आठवें और नावें ग्लोबल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने फ़्रांस जा चुके हैं. हाल की अपनी फ्रांस यात्रा में उन्होंने पेरिस के आइफिल टावर के नीचे अपने पर्यावरण स्लोगन की प्रदर्शनी लगाकर दुनिया भर के लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया। बिश्नोई समाचार नेटवर्क खमुराम बिश्नोई के जज्बे को सलाम करता है।

एक टिप्पणी भेजें