मृत्यु भोज बंद नहीं , स्वरूप बदलना चाहिए

किसी भी समाज की पहचान उसके रहन
सहन , रिती – रिवाज , पहनावे और खान
पान से होती हैं , ठीक उसी तरह हमारे
बिश्नोई समाज की पहचान जिस क्षेत्र में
बिश्नोई अधिक संख्या में निवास करते हैं |
वहां हिरणों की डार ,
खेजड़ी आदि वृक्षों की उपलब्धता ,
धार्मिक व सामाजिक आदि में पूर्ण
बिश्नोई पहनावा , वृद्ध का स्वर्गवास होने
पर खर्च में हलवे का प्रयोग आदि स्वस्थ
परम्परांए हमें बुजर्गों से पीढ़ी डर
पीढ़ी आती धरोहर के रूप में मिली | वैसे
तो समाज शुरू से साधन संपन्न था मगर पिछले
ढाई दशकों में जिस
सम्पन्ता की बुलन्दियों पर समाज पहुंचा वह
एक स्वर्णिम अवसरों में गिना जाएगा ,
क्योंकि सता में सीधी भागीदारी से यह
आसान हो गया |
इतना सब कुछ होने पर भी हम अपनी पहचान
को खत्म करने पर तुले हुए हैं | जगह – जगह
गाँवों में बैठकें करके फैसले लिए जाते हैं
कि मृत्यु भोज बंद करो | आखिर यह
कौनसी बुराई है जिसे हम पूर्णतया: बंद
करना चाहते हैं | ठीक है अगर इसमें
खामियां नजर आती है तो इसमें सुधार करने
की आवश्यता है जैसे एक वृद्ध का स्वर्गवास
हुए परन्तु दुर्भाग्य वश उसके माँ बाप या कोई
एक इनमें जीवित है तो हमें कतई खर्च
नहीं करना चाहिए | दूसरा अगर
स्वर्गवासी की उम्र 60 साल से कम है
तो भी हमें खर्च नहीं करना चाहिए | अगर
किसी महिला का स्वर्गवास हुआ है चाहे
उसकी उम्र 60 से ऊपर हो मगर कोई
उसकी बेटी अविवाहित हो तो भी खर्च
का प्रावधान नहीं बनता | हम इसे बंद करने
की बजाय कुछ जरुरी पहलुओं पर विचार करें
तो शायद हम अनावश्यक खर्चे से भी बचेंगे व
हमारी पहचान और परम्परा का मुख्य अंश
बचा पाएंगे |
उदाहरणतया: १. एक वृद्ध का स्वर्गवास हुआ
तो हम अपने परिवार कुटुम्ब के पांच सात घर व
गली मोहल्ले तथा गाँव में रहने वाले
निजी एक एक आदमी को खर्च में आमन्त्रित
करें |
२. उडावणी में आने वाले रिश्तेदार एक
रैली के रूप में ट्रैक्टर भर कर न आए पांच – सात
औरत आदमी ही शामिल हो |
३ किसी अनजान व्यक्ति की बजाय
हलवा सिर्फ हलवा विशेषज्ञ से ही बनवाएं |
४. हम नकारात्मक सोच में जी रहे है जैसे
किसी स्वर्गवासी व्यक्ति के खर्च में पांच
मण का धान बनाया और मान लो की पहले
ही खत्म हो गया तो हमारी धारणा बहुत
संकुचित है हम प्रचार करते है कि धान खत्म
हो गया | हमारी सकारात्मक सोच
होनी चाहिए कि अमुक
व्यक्ति का रुतबा इतना था कि हम ठीक से
आकलन नहीं कर पाए और हमारी सोच से
ज्यादा स्वर्गवासी को चाहने वाले थे
कि इसलिए ज्यादा व्यक्ति आए , अत:
दुबारा धान बनाने को कतई बुरे नजरिये से
नहीं लेना चाहिए |
५. धान बाने का पूरा जिम्मेदार
हलवा विशेषज्ञ को सौंप देना चाहिए व
दुबारा धान बनाने को सकारात्मक सोच
रखकर बुरा नहीं मानना चाहिए |
क्योंकि हमने अगर पांच मण का धान
बनाया और उसमे ढाई मण धान
लगा तो बाकि का हम परिवार व
पड़ोसियों में शाम को बांटेगे
जो दलिया कहलाएगा | आर्थिक नुकसान
भी हुआ और फज्जिहत भी | अगर हम ऊपर
लिखित बातों पर विशेष ध्यान रखे तो यह 4
-5 मण का खर्च एक मण में सिमट जाएगा और
हमारी पहचान , परम्परा भी कायम रह
जायेगी |
साभार :- इंजिनियर शंकर गोदारा (छोटू
बाड़मेर )9414611716
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2 टिप्पणियाँ

  1. Shok vayakt karne aye hue mehmano ko sada khana (dal, kadhi, roti) khilayi ja sakti hai. Purey Samaj main Kharch ke virodh main andolan chala hua hai. Bahut se gao main ye band bhi ho chuka hai. Kayi parvaro & individuals ne is kharchili pratha ko band bhi kar diya hai. Hairani ki baat hai hamare yuva kahi se matter ko copy-paste karke iska Samanthan kar rahe hai.

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  2. Kharch main halwe ka prayog koi swasth parampara ya sanskriti ya hamari pahchan nahi hai balki ek samajik burai hai. Eske chakar main Gareeb Bishnoi karje main dub jate hai. Jo paisa bachho ki padhai main lagna chahiye vo in rudhiyo main kaharch ho jata hai. Aise to kal ko aap baal vivah, parda pratha, manuhar (affem ) ko bhi hamare riti riwaz, sanskriti ya pahchan kah kar support karoge.

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